interesting fact about mathematics 

‘भारतीय अंक-प्रतीक’ में अनेक अंकों के प्रतीक-प्रतिपाद्य का व्याख्यान है। सामान्यतः गणना-प्रसंग में दस तक के अंकों का ही आदि-विधान मिलता है। इन्हीं अंकों तक सर्वाधिक अंक-प्रतीक उपलब्ध भी हैं। इसका कारण भी गणितज्ञों ने खोज लिया है। उनकी मान्यता है, मनुष्य ने अपने दोनों हाथों में पाँच-पाँच अर्थात् दस उँगलियों की संख्या सबसे पहले देखी। इसीलिए दस तक के अंकों का सर्वाधिक महत्त्व है। हाथ को ‘पंचशाख’ कहते हैं। पाँच उँगलियों के रूप में पाँच शाखाएँ फटती हैं। अब अलग-अलग उँगलियों का नाम-संस्कार किया गया-अंगुष्ठ, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा। ये सभी उँगलियाँ मुहावरे से लेकर प्रतीक तक बनती चली गईं। अँगूठा दिखाना किसी को नींचा दिखाना हो गया। तर्जनी दिखाना दोषारोपण हो गया। मध्यमा सबसे बड़ी होकर भी मध्यम-व्यायोग की पीड़ा में पड़ी रही। अनामिका का महत्त्व सर्वाधिक हो गया। जिसका कोई नाम नहीं (अ-नामिका), वही नाम कमा गई। करमाला की सभी जपगणना अनामिका से आरंभ होती है। अनामिका से ही चंदन लगाते हैं। अनामिकांगुष्ठ से ही पूजार्चन करते हैं। इन्हीं से ‘पूजयामि नम: तर्पयामि नम:’ कहते हैं। कविगण कहने लगे, ‘अनामिका सार्थवती बभूव’। अँगरेजी में इसे मुद्रिकांगुलि (रिंग फिंगर) कहते हैं। यह अँगुली विवाह-बंधन की गवाह बन गई। बेचारी कानी (कनिष्ठा) उँगली बच्चों के बीच दोस्ती तोड़ने का इशारा, संकेत और प्रतीक बन गई। दोषारोपण और दोष-निर्देश में यदि एक उँगली (तर्जनी, फोरफिंगर) दूसरे की ओर उठाई जाती है तो प्रतिपक्षी जवाब में उँगलियों की व्याख्या से ही उत्तर देता है। वह कहता है, तुमने एक उँगली मेरी ओर उठाई है, पर जरा देखो तो तुम्हारी अपनी ही तीन उँगलियाँ तुम्हारी ओर संकेत कर रही हैं। तुम मुझसे तीन गुना दोषी हो।

अँगरेजी के प्रसिद्ध कवि एजरा पाउंड ने अपनी प्रसिद्ध कविता। ‘डांसिंग गर्ल’ में उँगलियों का वर्णन एक अनूठे और अछूते बिंब के साथ किया है। नायक के वक्ष पर नायिका की नंगी, गोरी, चमकीली और सुंदर बाँह पड़ी है। वे लिखते हैं-‘As a rillet among the sedge are thy hand upon me, a froasted stream.’ पाउंड बाहु को पतली, लचकदार, चमकीली नदी (Rillet) से उपमित करते हैं। फिर नदी आगे चलकर पाँच धाराओं में विभक्त हो जाए और उँगलियों की नोंक तक आते-जाते बाहु-प्रवाह जम जाए।

कंबन कवि ने अपनी कंबरामायण में सीता के विलाप का वर्णन करते हुए उनकी बाहु, करतल, उँगलियाँ और वक्ष का वर्णन किया है। वियोग में नारियाँ छाती पीटती हैं। सीता भी नारी हैं। वियोग की दशा में वे ऐसा ही करती हैं। कमल की नाल पर लाल कमल खिलता है। उसकी पंखड़ियाँ खिलती हैं। सीता की भुजाएँ कमलनाल की तरह हैं और करतल रक्तकमल की तरह। उँगलियाँ रक्तकमल-दल हैं। अंगुलि-सहित करतल लाल (रक्तकमल) इसलिए हो गया है कि छाती पीटते समय इन कोमल करतलों को चोट लगती है, क्योंकि वक्षःस्थल पर श्रीफल तथा नारिकेल-उपमित पयोधर हैं। इन फलों की कठोरता और करतल की सुकुमारिता। दोनों भिन्न-गुणधर्म के अंग हैं। इन्हीं दसों उँगलियों से सैकड़ों वैदिक तथा तांत्रिक मुद्राएँ बनती हैं, जैसे धेनुमुद्रा, भगवतीमुद्रा। शिवमुद्रा, शंखमुद्रा, घंटामुद्रा, आवाहनी मुद्रा और ऐसी अनेक-अनेक मुदाएँ। ये हाथ कर्मेंद्रिय हैं। उँगलियों को जोड़कर करतल सीधा कर हाथ ऊपर उठाने पर यह देवी-देवताओं की अभय मुद्रा बनती है। यह वरदान सिद्ध होता है। यह आज भी बड़े लोगों के द्वारा आशीर्वाद देने का ढंग है। यह अपनी आतुर प्रथमता घोषित करने की देहभाषा या अशब्द भाषा (Non-Verbal body language) है। यहीं से संकेत और प्रतीक का प्रारंभ होता है। एक वर्ग में अनेक छात्र बैठे हैं। शिक्षक कोई प्रश्न करता है। अचानक तीन-चार हाथ उन्नत और सम-युत उँगलियों के साथ ऊपर उठ जाते हैं। शेष सौ-पचास छात्र चुप बैठे हैं। जाहिर है, ये ऊर्ध्वबाहु छात्र कह रहे हैं-मुझे इस प्रश्न का उत्तर ज्ञात है। इन्हीं उँगलियों और हाथों को ऊपर उठाकर हम नारे लगाते हैं। हाथ लहराना हमारी बुलंदी को सिद्ध करता है।

कालिदास की कथा सभी जानते हैं। किंवदंती है-वे पहले मूर्ख थे। बल्कि कहा गया, महामूर्ख थे। एक बार जिस डाल पर वे बैठ थे, उसी को काट रहे थे। इधर काशी की विदुषी, किंतु रूपगर्विता विद्योत्तमा ने प्रतिज्ञा कर रखी थी कि शास्त्रार्थ में जो पुरुष-पंडित उसे पराजित कर देगा, वह उसी से विवाह रचा लेगी। पंडित आते और पराजित हो-होकर लौटते जाते। एक बार इन पराजित पंडितों में कुछ ने मिलकर परामर्श किया और निष्कर्ष बना कि किसी छल-छलाक्षर से इस अहंकारिणी विदुषी विद्योत्तमा का विवाह किसी प्रचंड मूर्ख से करा देना चाहिए। फिर यह विद्वन्मंडली महामूर्ख की खोज में निकल पड़ी। रास्ते में एक सुंदर युवक, पर महामूर्ख वही कालिदास मिले, जो उसी डाल को कुल्हाड़े से काट रहे थे, जिसपर बैठे थे। सभी देखकर एकमत थे कि इससे अधिक मूर्ख नहीं मिल सकता। फिर रूप और यौवन भी है।

मंडली से एक पंडित ने समीप जाकर उस युवक से नीचे उतरने का निवेदन किया। उसने फटकार दिया। कहा-‘‘रास्ता नाप, मैं अपना काम पूरा करके ही नीचे उतरूँगा।’ दूसरे पंडित ने युक्ति लड़ाई। कहा-‘तुम्हारा विवाह कराने आया हूँ।’ सुनते ही युवक डाल से नीचे कूद पड़ा। स्वाभाविक रीति से नीचे आने में समय लगता। विवाह का प्रश्न था। वह एकदम कूद पड़ा। पैरों में मोच आ गई पंडितों ने पैर दबाए। उपचार किया। जड़ी-बूटी दी। हल्दी-चूना चढ़ाया। चोट कोई खास थी नहीं। फिर शादी की उमंग थी। वह घंटे-दो घंटे में ठीक हो गया।

पंडितों ने उस सुंदर युवक को अचकन-पचकन, पीतांबर-दुशाले, पाग-पगड़ी से सज्जित कर और भी शोभनीय बना दिया। कहा-‘चलो, अभी विवाह कराते हैं, पर एक शर्त है। बोलना कुछ नहीं। जहाँ बोले, शादी रद्द। कल से चाहे जितना बोल लेना। हाँ, हाथ और उँगलियों से जो हरकतें कर दिखानी हैं, कर लेना। बस, बोलती बंद रखना।’ युवक हर शर्त मानता चला गया।
शास्त्रार्थ-सभा शुरू हुई। पंडितों ने अपने महापंडित के मौनव्रत की चर्चा करते हुए संकेत और देहांग-भाषा में शास्त्रार्थ करने का अनुरोध किया। विद्योत्तमा मान गई। उसने एक उँगली उठाई। उसका तात्पर्य था, ‘ईश्वर एक है। अद्वैत ही ईश्वरत्व है।’ युवक की समझ में आया, ‘यह हमारी एक आँख फोड़ना चाहती है।’ अतः उन्होंने तत्क्षण दो उँगलियाँ ऊपर कर दीं। अर्थात् ‘तुम तो एक आँख फोड़ने की बात कर रही हो, मैं तुम्हारी दोनों आँखें फोड़कर अंधी बना दूँगा।’
पंडितों ने व्याख्या की, ‘ईश्वर एक है। आपने ठीक कहा, पर प्रकृति और विश्व के रूप में वही अन्य रूप धारण करता है। अतः पुरुष और प्रकृति, परमात्मा और आत्मा दो-दो शाश्वत हैं।’ श्रोताओं ने ताली बजाकर पंडितमंडली की व्याख्या का समर्थन कर दिया।

फिर विद्योत्तमा ने हथेली उठाई। पाँचों उँगलियाँ ऊपर की ओर उठी थीं। उनका तात्पर्य था, ‘आप जिस प्रकृति, जगत् जीव या माया के रूप में द्वैतवाद को स्थापित कर रहे हैं, उसकी रचना पंचत्तत्व से होती है। ये पंचतत्त्व हैं-पृथ्वी, पानी, पवन, तेज और आकाश। ये सभी तत्त्व भिन्न और अलग हैं, इनसे सृष्टि कैसे हो सकती है ?’
युवक की अक्ल में समझ आई, ‘यह युवती अब मुझे थप्पड़ मारना चाहती है। इसीलिए हाथ उठाया है और थप्पड़ (करतल) दिखा रही है। ‘अच्छा, कोई बात नहीं। मैं अभी तुझे मजा चखाता हूँ।’ यह सोचकर उसने उँगलियों को समेटकर कड़ी मुट्ठी बाँध ली और विद्योत्तमा की ओर मुट्ठीवाला हाथ आगे फैला दिया। पंडितों ने व्याख्या की, ‘जब तक पंचतत्त्व अलग-अलग रहेंगे, सृष्टि नहीं होगी। पंचतत्त्व करतल की पंचांगुलि है। सष्टि तो मुष्टिवत् है। मुट्ठी में सभी मिल जाते हैं तो सृष्टि हो जाती है। यही तात्पर्य है, हमारे युवा महापंडित का।’ सभा-मंडप की दर्शक दीर्घा से फिर तालियाँ बजीं। अततः घोषणा हुई, विद्योत्तमा हार गई और इस तरह उसका विवाह उस महामूर्ख युवक से हो गया।

लोककथा, जनश्रुति और अत्यल्प उद्धरणों से पुनर्निर्मित कालिदास की जीवनी की कथा आगे बढ़ती है। रात में ही कालिदास एक ऊँट की आवाज पर जवाब और प्रतिक्रिया में बोल पड़े। विद्योत्तम ने माथा पीट लिया। ‘अरे, यह तो महापंडित के रूप में महामूर्ख निकला।’ उसने युवक को उसी रात, उसी क्षण घर से निकाल दिया।
आगे की कथा इस स्थान पर अप्रासंगिक है। संक्षेप में यह उल्लेख्य है कि कालिदास बाद में विद्वान बने और विश्वख्याति अर्जित की। इन्हीं कालिदास के लिए कहा गया-

 

‘पुरा-कवीनां गणना-प्रसंगे कनिष्ठिकाधिष्ठितकालिदासः।
अद्यापि तत्तुल्यकवेरभावात् अनामिका सार्थवती बभूव।’

 

उसी दिन से कई बातें घटित हो गईं। ‘महापंडित’ का अर्थ ‘महामूर्ख’ हो गया। आज भी लोग निरक्षर, किंतु निकटस्थ व्यक्ति को संबोधित करते हैं, ‘कहो महापंडित ! क्या समाचार हैं ?’ दूसरी बात यह कि कालिदास ने पृष्ठांकित अक्षरभाषा को छोड़कर देहांग को पढ़ना आरंभ कर दिया। वर्ण-परिचय तो दो-चार दिनों के अभ्यास का परिणाम हो सकता है। महत्त्वपूर्ण है, भाव और बोध। इसका अभिज्ञान जीवन के व्यवहार-प्रांगण में होता है।

उँगलियों से संबद्ध अनेक मुहावरे बन गए-उँगली दिखाना, उँगली पर नाचना, दाँतों तले उँगली दबाना, कानों में उँगली डालना, मुँह में उँगली डालकर बोलवाना, उँगली उठाना, अँगूठा दिखाना, अँगूठा चूमना इत्यादि। अंगुलियुक्त करतल के साथ भी मुहावरे बने-थप्पड़ उठाना, हाथ मारना, मुट्ठी बाँधना, घूँसा (मुट्ठी) मारना इत्यादि। फारसी का मुहावरा है, बदयाँ गिरफ्तन (दाँतों तले उँगली दबाना-आश्चर्य करना)। हिंदी में ‘हाथ का जस वाक् का सत्त’ मुहावरा प्रसिद्ध है। फणीश्वरनाथ रेणु ने इसी मुहावरा-शीर्षक से एक प्रसिद्ध कहानी लिखी। मुट्ठी-भर धूप (कृतनारायण प्यारा), नाखून बढ़े अक्षर (डॉक्टर रवींद्र राजहंस), हथेली पर का आदमी (डॉक्टर शांति जैन) जैसी पुस्तकें भी छपीं।

ऋग्वेद में ‘मुष्टिदत्तया’ (मुक्का मारना) मुहावरा मिलता है। बेबीलोनिया में एक मुहावरा प्रचलित है, जिसका अर्थ है, परमात्मा ने उँगलियाँ इसलिए दी हैं कि यदि दूसरे अप्रिय वचन बोलें तो हम कान बंद कर सकें। महात्मा गाँधी के तीन बंदर इन्हीं उँगलियों से कान, आँख और मुँह बंद करते हैं। ‘बापू के तीन बंदर’ का अभिप्राय है, बुरा नहीं सुनें, बुरा न देखें और बुरा न बोलें। बापू ने यह प्रतीक फारसी मुहावरा से लिया है, गोश बद्द, चश्म बद्द, लव बद्द, ऐसा विनोबा भावे का अभिमत है।
फारसी में ‘पंजकस’ का अर्थ है ‘ पंजा लड़ाना’। पंजा शब्द पंच (पंचांगुलि) से ही बना है। पंजा से कई मुहावरे बने-पंजा लड़ाना, खूनी पंजा, नाखूनी पंजा। संगीत में पंचम स्वर, तत्त्व में पंचतत्त्व तिथियों में पंचमी तिथि इत्यादि उँगली से गणना के परिणाम हैं। फिर प्रतीक बनने लगे। पंचमी तत्त्व आकाश है। आकाश शून्य है। शून्य को नारी का प्रजनन-स्थल माना गया। ऐसा तंत्र-ग्रंथों में उल्लेख है।

फारसी का प्रसिद्ध मुहावरा ‘दस्त पाक बूदन’ का अर्थ है ‘हाथ का जस वाक् का सत्त।’ भारतीय शुभाचरण में एक है प्रातःकरदर्शन। श्लोक है-‘कराग्रे वसते लक्ष्मी, करमध्ये सरस्वती, करमूले स्थिता ब्रह्मा (कालिका) प्रभाते करदर्शनम्।’ यह वैदिक विधान है। तांत्रिक विधान में ब्रह्म के स्थान पर काली हैं-‘करमूले स्थिता काली।’ विशिष्टता-प्रदर्शन के लिए ‘अंगुलिगण्य’ विशेषण का प्रयोग होता है। हथेली (करतल) पर ही आत्मतीर्थ (कायतीर्थ), देवतीर्थ तथा पितृतीर्थ के स्थान हैं। इन्हीं स्थलों से भिन्न-भिन्न तर्पण-विधान है। ‘हस्तरेखाशास्त्र’ का निर्माण करलत की रेखाओं पर ही आधारित है। अँगूठे का निशान किसी भी दस्तावेज की प्रामाणिक अनुबंधधर्मिता है।
पृथ्वीराज को चंदवरदाई ने आत्मरक्षा का संकेत जिस पद से दिया था, उसमें अंगुलि-प्रमाण का उल्लेख है, ‘चार बाँस, चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमान, एते पै सुलतान है मत चूको चौहान।’
अंगुलि का व्याख्या में व्याकरण-विधान है,‘अंगुल्यां कायते निधीयतेऽसौ अंगुली।’

कर्मेंद्रिय पाँच हैं-हाथ, पैर, मलद्वार, मूत्रमार्ग और वाणी। इनमें वाणी और हाथ को सर्वाधिक महत्त्व दिया गया है। मुख बोलता है, हाथ लिखता है। एक वक्ता और दूसरा लेखक है। अक्षर (उच्चरित) और वर्ण (लिखित) का विकास इन्हीं दोनों कर्मेंद्रियों के परिणाम हैं। वाक्-व्यक्त भाषा और अंगुलि-संकेत भाषा है। मूक-वधिर इन्हीं अंगुलियों की मुद्राओं से बोलते हैं। नेत्रहीन इन्हीं अंगुलियों से लिखते और पढ़ते भी हैं। नेत्रहीनों के नेत्र अंगुलियाँ ही हैं।
आनंद और उल्लास में ताली बजाना (करतल-ध्वनि) अशब्दभाषा है। ‘तालियों की गड़गड़ाहट’ प्रशस्तिसूचक संकेत हैं। उपमा भाषा में शरीर एक वृक्ष है। बाहुएँ शाखाएँ हैं। अंगुलियाँ प्रशाखाएँ या प्ररोह हैं। प्ररोह अधोमुखी होते हैं। वट-वृक्ष के अधोमुखी प्ररोह उदाहरण हैं। अंगुलियों पर नख होते हैं। नख पर साहित्य और ज्योतिषशास्त्र भी है। श्रृंगार-प्रकरण में नखों की अलक्तक या नेल पॉलिश से रगने का विधान है। हथेली को मेंहदी से रचाना शुभ-सौभाग्य-लक्षण माना गया। तंत्र की हस्तमुद्राएँ तो उत्तरोत्तर विशिष्टिता प्राप्त करती गईं।

तात्पर्य यह कि मानव-वंश ने अपनी अँगुलियों पर ही गणनाशास्त्र सीखा। कालांतर में इसका विकास हुआ। मनुष्य की विशिष्टता के दो आधार माने गए हैं-प्रज्ञा तथा उँगलियाँ। प्रजा से वह त्रिकाल-दर्शन करता और उँगलियों से चिंतन को साकार रूप देता है। सभी आविष्कार उँगलियों की सूक्ष्म सक्रियता के परिणाम हैं। ‘भारतीय अंक-प्रतीक-कोश’ में सहस्राधिक शब्दों के अंक-प्रतीक उपस्थित किए गए हैं। प्रत्येक अंक के क और ख दो खंड हैं। ज्ञान को अंकबद्ध-रूप में सीखने-समझने का यह शास्त्र प्राचीन है। अभी तक इस विषय पर कोई पुस्तक नहीं थी। हिंदी में अपने विषय की यह पहली पुस्तक है।
मुझे आशा है, शास्त्र-मंथन से उपलब्ध यह अंक-प्रतीक-कलश जिस ज्ञानामृत से भरा है, पाठकों को तृप्त करेगा। यहाँ एक बात उल्लेखनीय है। यह कार्य-समय-साध्य और कठिन अवश्य है, पर मेरा मौलिक नहीं है। मैंने भारतीय ज्ञान-सागर में उपलब्ध अंक-प्रतीकों का ही संचयन किया है। इसलिए संचयनकर्ता से अधिक श्रेय का मैं अधिकारी हूँ भी नहीं। हाँ, चयन-वृत्ति और उपस्थापन-विधान मेरा अपना अवश्य है। मैं सुधी पाठकों की प्रतिक्रिया तथा परामर्श की अपेक्षा अवश्य रखता हूँ।

बहुत शब्द ऐसे हैं, जिनका संद्रोभल्लेख आवश्यक नहीं। जैसे कालभेद-भूतकाल, वर्तमान तथा भविष्यकाल। इसका उल्लेख सभी व्याकरण ग्रंथों में मिलता है। ऐसे ही अनेक शब्दों के साथ संदर्भोल्लेख उपस्थित किया गया है। शब्दों को अक्षरानुक्रम से रखा गया है।
बहुसमय-श्रम-साध्यता तथा सावधानता के बावजूद इस ग्रंथ को पूर्ण-संपूर्ण नहीं कहा जाएगा, क्योंकि ऐसे अंक-प्रतीक और भी हैं। ज्ञान के जितने अनुशासन तथा शाखाएँ हैं, उन्हें-एकत्र समेकित कर पाना संभव भी नहीं। यहाँ इस ग्रंथ में दो हजार से अधिक शब्दों के अंक-प्रतीक उपस्थित किए गए हैं। यह दस वर्षों के श्रम का परिणाम है।
छूट का होना संभव और स्वाभाविक है। फिर भी सुधी सज्जनों के परामर्श को अगले संस्करण में नामोल्ल्खपूर्वक ध्यान में रखूँगा।
इस ग्रंथ की पांडुलिपि तैयार करने में मृत्युंजय कुमार मनोज ने समर्पित सहयोग दिया है। श्री मनोज तो मेरे साथ दिल्ली-पटना, पटना-दिल्ली भी आते जाते रहे। मैं उन्हें आशीर्वाद देता हूँ।
अंत में मैं सुधी पाठकों की निर्मल प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा में हूँ।Intresting

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हेलो दोस्तों! मेरा नाम भेरू सिंह है मेरे बारे में क्या बताऊँ छोटा मुह बड़ी बात is website par apko blogging,seo,adsense,android tricks and tips facebook triks milegi pasand aye to age bhi share karna

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